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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

नहीं क्या! दिल पर रखकर हाथ कहिये!


बहुत सारे लोग मानते हैं कि वे साम्यवादी नहीं हैं। कुछ लोग साम्यवादी होने को घृणा की नजर से भी देखते हों, तो कोई अचरज नहीं! घृणा और प्रेम सबसे अधिक की जाने मानसिक चर्या और सबसे कम समझा जानेवाला मानव प्रसंग है।

तो क्या ऐसे लोग सचमुच साम्यवादी नहीं होते हैं! नहीं। सही बात तो यह है कि साम्यवादी हुए बिना मनुष्य जी नहीं सकता। साम्यवाद एक ऐसी व्यवस्था को साकार करने का स्वप्न है जिसमें प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार लिये जाने तथा प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार दिये जाने की अधिकतम संभावना हो। यानी, योग्यता के अनुसार दो, जरूरत के अनुसार लो! योग्यता के अनुसार देने, जरूरत के अनुसार पाने के हक की व्यवस्था को नकारकर कोई परिवार टिक ही नहीं सकता है! वृहत्तर परिवार बोध के कारण भी उत्सव सामाजिक और मानवीय आकांक्षा के रूप में महत्त्वपूर्ण होते हैं। उत्सवों के इस मौसम में हमें बाजार के कोलाहल से कान बचाकर इस धीमे, बहुत ही धीमे स्वर को भी सुनने की कोशिश करनी चाहिए कि साम्यवादी आचरण को त्याग कर लगातार टूटन की तरफ बढ़ते परिवार नाम की सामाजिक संस्था को बचाया नहीं जा सकता है! क्या हम पसंद करेंगे कि परिवार का जो सदस्य जितना कमाता है वह उतना आनंद भोग करे और जो कम कमाता है या बेरोजगार है वह बस टुकुर-टुकुर ताकता रहे! शायद नहीं! जिस बोध के बिना अपना परिवार खुश नहीं रह सकता उस बोध के अभाव में देश, दुनिया में खुशी कैसे आ सकती है। साम्यवाद का निषेध तो आत्म-निषेध है। हाँ, मैं जानता हूँ, साम्यवाद के रास्ते बहुत कठिन हैं लेकिन इसके निषेध से तो रास्ता बंद ही हो जाता है। 

घृणा और प्रेम के बिना हम रह नहीं सकते और इसे जाने बिना हम अपने आँगन में खुशी की अल्पना रचने की कल्पना भी नहीं कर सकते। नहीं क्या! दिल पर रखकर हाथ कहिये!

सोमवार, 25 अगस्त 2014

वही मिजाज, हाँ वही तो हो

बड़े लोगों के आगमन की खबर पाकर रास्ते की मरम्मत तेजी से होने लगती है। साफसफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। आननफानन में व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रयास किया जाता है। बड़े लोग आते हैं और चले जाते हैं, कुछ दिनों तक ही सही साधारण लोगों को भी इस दुरुस्तीकरण का लाभ मिलता रहता है। सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं का इस्तेमाल बड़े लोग नहीं करते हैं इसलिए उनके रखरखाव पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। बड़े लोगों के बच्चों सार्वजनिक स्कूल में दाखिला लेने से, उस स्कूल के स्तर के वैसे ही यथायोग्य होने की संभावना बढ़ सकती है। बड़े लोगों के सार्वजनिक परिवहन का व्यवहार करने से सार्वजनिक परिवहन की दशा सुधर सकती है। बड़े लोगों को जेल होने से जेल तक का स्तर सुधर जाता है। इसलिए ऐसी धारणा रही है कि सार्वजनिक सेवा संस्थानों का इस्तेमाल बड़े और बहुत बड़े लोग (वीआइपी) करें तो सेवा संस्थानों की गुणवत्ता में काफी सुधार हो सकता है। रखरखाव में लगे अधिकारी-कर्मचारी चाकचौबंद होकर अपना काम करेंगे। जिसका फायदा आम लोगों को भी मिल सकता है। 

अब यह धारणा खंडित हो गई है। बड़े लोगों के सार्वजनिक संस्थान आम आदमी को बिना किसी पूर्व सूचना के सार्वजनिक स्थल से खदेड़ बाहर किया जाता है। जिस रास्ते से वे गुजरते हैं, उन रास्तों को आम आदमी के लिए घंटों बंद कर दिया जाता है। किसी कारण से तात्कालिक रूप से साधारण आदमी के उधर से गुजरने की अनुमति दी जाती है तो उसे इतनी हुज्जत का सामना करना पड़ता है कि नाक में दम आ जाये। यह सब होता है सुरक्षा के नाम पर। ठीक है कि सुरक्षा तो सुनिश्चित की ही जानी चाहिए, लेकिन हर किसी की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। दिल्ली के मेट्रो के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के इस्तेमाल से कैसी परेशानी लोगों को हुई थी, यह लोगों के ध्यान में है। बड़े लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए साधारण आदमी को अव्यवस्था या असुरक्षा में डालना उचित नहीं कहा जा सकता। बड़े लोग सार्वजनिक संस्थानों की सेवाओं का इस्तेमाल करें इसके लिए साधारण आदमी को सार्वजनिक संस्थानों की सेवाओं का इस्तेमाल करने से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन यह सब होता है।

इस तरह के समाचार आ रहे हैं कि प्रधानमंत्री अपने स्वास्थ्य की सामान्य जाँच के लिए एम्स गये थे। उनके सामान्य जाँच के लिए एम्स में असामान्य परिस्थिति बन गई। दूर-दराज से आये मरीजों को भी दरकिनार कर दिया गया। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित किया जाना हम सब की प्राथमिकता है। लेकिन यह सवाल प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में लगे लोगों के सामने क्यों नहीं होना चाहिए कि लोगों को परेशानी में डाले बिना कैसे सुरक्षा सुनिश्चित किया जाये! खासकर तब जब नरेंद्र मोदी जैसे साहसी प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था का मामला हो। लालकिला से बिना किसी सुरक्षा घेरेबंदी के भाषण करने का साहस रखनेवाले प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था को क्या बिना किसी हंगामे के सुनिश्चित नहीं किया जा सकता था? यह ठीक है कि बड़े लोगों का मामला है। यह वे ही तय कर सकते हैं। वे जब चाहें खुले आम प्रकट हो जायें, जब चाहें आम जगह पर आम आदमी का घुसना बंद कर दें। यह बड़े लोगों का मामला है। बड़े लोगों के मामलों में, संविधान, कानून, जनतंत्र, समानता, अधिकार आदि की भावनाओं का कोई मतलब ही नहीं होता है! ऐसे मामलों में, संविधान, कानून, जनतंत्र, समानता, अधिकार आदि को घसीटना ठीक नहीं है, यह बड़े लोगों की तो है ही मुल्क की भी तौहीन है! वही काफिला, वही मिजाज, हाँ वही तो हो!