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सोमवार, 22 सितंबर 2014

बाजारवाद का संस्कृति पर प्रभाव

बसे पहले मैं रवींद्र भारती विश्वविद्यालय को इतने मौजूँ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ साथ ही इस महत्त्वपूर्ण विचार गोष्ठी में दो शब्द रखने का मौका देने के लिए मैं विश्वविद्यालये प्रति आभार प्रकट करना चाहता हूँ। गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम पर स्थापित रवींद्र भारती विश्वविद्यालय को इस विषय पर विचार गोष्ठी आयोजन का अपना अतिरिक्त महत्व है। अकारण नहीं है कि 14 मई 1941 को अपने जन्मदिन के अवसर पर गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने जो अंतिम संदेश दिया उसका शीर्षक ‘सभ्यता का संकट’ है और हाल के दिनों में पी. सैमुअल हट्टिंग्टन की जिस किताब की वैश्विक स्तर पर गंभीर चर्चा हुई उसका शीर्षक भी 'Clashes of Civilization' अर्थात, सभ्यता का संघात है।

यह विषय महत्त्वपूर्ण क्यों है ? यह महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि इसमें सभ्यता के प्रवाह में उपस्थित नये बाँक पर विचार किये जाने के अवसर का संकेत है। भारतीय वाङमय में सभ्यता की चर्चा तो बहुत बार हुई है लेकिन संस्कृति शब्द का उल्लेख अपेक्षाकृत कम अवसरों पर ही हुआ है। इसका एक कारण तो यह है कि सभ्यता का निर्माण किया जाता है लेकिन संस्कृति का विकास होता है। मनुष्य सभ्यता की रूपरेखा को बहुत हद तक तय या नियंत्रित कर सकता है। सभ्यता के अनुसार संस्कृति का विकास स्वतः होता रहता है, संस्कृति ती विकासमान प्रक्रिया तय और नियंत्रित करना संभव नहीं होता है। बहुत विस्तार से सभ्यता और संस्कृति के अंतस्संबंधों या समानता - असमानता पर चर्चा का यहाँ अवसर नहीं है फिर भी इतना संकेत कर देना जरूरी है कि सभ्यता का संबंध जीवनयापन की पद्धतियों से होता है जबकि संस्कृति संपूर्ण जीवनशैली है। स्वभावतः जीवनशैली को समझने के लिए जीवनयापन की पद्धतियों को समझना जरूरी है। कहना न होगा कि शिकार युग, कृषि युग, औद्योगिक युग और अब उपस्थित तकनीक युग में जीवनयापन की पद्धतियों में कुछ मूलभूत अंतर है और इस अंतर से संस्कृति की आंतरिक संरचना में अंतर का आना इसकी तार्किक परिणति है। उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के इस दौर में जीवनयापन की परिस्थितियों और पद्धतियों में भारी अंतर आया है। सृजनशील समाज में आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, उपभोक्ता समाज में आविष्कार आवश्यकता का पिता बनकर उपस्थित होता है। सृजनशील समाज और उपभोक्ता समाज के अंतर पर संक्षेप में ही सही पर थोड़ा ठहर कर विचार कर लेना जरूरी है। सृजनशील समाज आजीविका प्रधान होता है। उपभोक्ता समाज रोजगार प्रधान। आजीविका और रोजगार में अंतर यह होता है कि आजीविकामूलक श्रम में पैसा का जुड़ाव अनिवार्य नहीं होता है जबकि रोजगारमूलक श्रम में पैसा का जुड़ाव अनिवार्य होता है। जाहिर है आजीविकामूलक श्रम अधिक सृजनशील होता है जबकि रोजगारमूलक श्रम का शील पैसा से परिभाषित होता है। जल-जमीन-जंगल और अंततः जीवन से बेदखल होती जा रही बहुत बड़ी आबादी आजीविका से तो वंचित हो गई लेकिन रोजगार के अवसरों से जुड़ नहीं पाई है। भूख के भयानक भँवर में फँसी सभ्यता में किस प्रकार की संस्कृति विकसित हो सकती है, इसका अनुमान बहुत कठिन नहीं है। अपने विख्यात प्रबंध ‘सभ्यता का संकट’ में गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने ध्यान दिलाया कि ‘सभ्यता का जो रूप हमारे देश में प्रचलित था उसे मनु ने ‘सदाचार’ कहा’[1]। इसके साथ ही गरूदेव ने 'भारत में राष्ट्रीयता' शीर्षक अपने प्रबंध में यह भी ध्यान दिलाया कि ‘जो लालच ताकतवर राष्ट्रों के लिए घातक है, वह कमजोर के लिए उससे भी बड़ा खतरा है। भारतीय जीवनधारा में मैं यह स्थिति नहीं देखना चाहता, भले ही यह अमरता के देवता का ही वरदान क्यों न हो। हमारे जीवन को बाहर से सादा फिर भी भीतर से उच्च रहने दो। हमारी सभ्यता सामाजिक सहयोग के अपने उसूलों पर ही रहे न कि आर्थिक शोषण और संघर्ष के रास्ते पर बढ़े। खून चूसनेवाले अर्थिक राक्षसों के बीच रहते हुए ऐसा कैसे हो सकेगा, इस पर प्राच्य राष्ट्रों के वे चिंतक सोचें, जो मानवीय आत्मा में अभी भी विश्वास रखते हैं। यह कायरता और आलस्य का ही चिह्न है कि हम उन परिस्थितियों को स्वीकार कर लें जो ऐसे लोगों के द्वारा ही निर्मित हैं, जिनके आदर्श हम से अलग हैं। हमें सक्रिय रूप से कोशिश करनी चाहिए कि हम ऐसी शक्ति अर्जित कर सकें, जो हमारे इतिहास का सच्चा मार्गदर्शन करे।’[2]

‘उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो चुका होगा कि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। फिर भी मैं ‘माँग’ और ‘आपूर्ति’ का नियम स्वीकार करता हूँ। यह भी स्वीकार करता हूँ कि इंसान सदा उससे ज्यादा पाना चाहता है, जितना कि उसके लिए अच्छा है। बावजूद इसके मैं इस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ कि मानवता में सामंजस्य की पूर्णता होती है, जहाँ गरीबी उसके मूल्य नहीं छीन पाती, जहाँ हार भी उसे जीत की ओर ले जाती है, मौत भी अमरता देती है और क्षतिपूर्ति के रूप में शाश्वत न्याय जो सबसे छोटी है, उन्हें अपने अपमान को सुनहरी जीत में बदलने का मौका देता है।’[3] महात्मा गाँधी ने भी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंद स्वराज' में लगभग चेतावनी के स्वर में कहा था कि प्रकृति हमारी जरूरत अर्थात Need को पूरा कर सकती है लेकिन लालच अर्थात Greed को नहीं।

‘बाजारवाद और बदलती संस्कृति’ पर विचार करते समय संस्कृति संबंधी भारतीय चिंतनधारा के इस पहलू को ध्यान में रखना होगा। कभी-कभार हिंदी में लिखनेवाले अर्थशास्त्रियों के विचार में ‘बाजारवाद’ नामका कोई वाद है ही नहीं। 










[1] रवींद्रनाथ ठाकुर : सभ्यता का संकट -1941 : अनुवाद भक्ति पटेल:सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, सं, डॉ.शंभुनाथ:वाणी प्रकाशन-2004 


[2] रवींद्रनाथ ठाकुर : भारत में राष्ट्रीयता -1917 : अनुवाद भक्ति पटेल:सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, सं, डॉ.शंभुनाथ:वाणी प्रकाशन-2004 


[3] रवींद्रनाथ ठाकुर : भारत में राष्ट्रीयता -1917 : अनुवाद भक्ति पटेल:सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, सं, डॉ.शंभुनाथ:वाणी प्रकाशन-2004

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

हिंदी मेलाः सपनों और संभावनाओं का एक सिलसिला

हिंदी मेला का यह दसवाँ साल है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों में आरंभ का उत्साह बहुत होता है। कठिन होता है, निरंतर जीवंत आत्मनिरीक्षण की गुंजाइश को बनाये रखते हुए उस उत्साह को टिकाये रखना। बाहर से देखने पर दस साल का समय कोई बहुत बड़ा समय नहीं होता है। भीतर से देखा जाये तो, दस साल तक लगातार सार्थकता की ओर बढ़ते रहने के संकल्प को बचाये रखना कम बड़ी बात नहीं होती है। खासकर आज के समय में जब तेजी से जीवन संदर्भों में अनपेक्षित बदलाव अध्यारोपित हो रहे हैं। कहना न होगा कि इन बदलावों के साथ ही सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवन-आकांक्षाओं की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं में भी बदलाव तेजी से घटित हो जाते हैं। वह समय बहुत ही चुनौतीपूर्ण हुआ करता है जिस समय में हवा की विभिन्न लहरें न सिर्फ अपनी तयशुदा दिशा में बहा ले जाने के लिए सक्रिय रहती हैं बल्कि प्रतिरोध या किसी भी प्रतिविचार को निर्ममतापूर्वक छिन्न-भिन्न कर देने की क्रूरता पर भी आमादा रहती हैं। हमारा समय ऐसा ही है। इन दस वर्षों में किसी भी रूप में हिंदी मेला की गतिविधयों के साक्षी रहे लोगों के लिए पीछे मुड़कर देखना दिलचस्प और जरूरी है। हिंदी मेला को नहीं जाननेवालों तक इसकी जानकारी पहुँचाने की कोशिश का भी यह तकाजा है कि निश्च्छल आत्मावलोकन किया जाये ओर हिंदी मेला के विकासमान पाठ के संदेश को बार-बार पढ़ा जाये।
दस साल पहले जब हिंदी मेला प्रारंभ हुआ तो इसके पीछे क्या कारण थे क्या थीं इसकी तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रेरणाएँ? क्या इसके भीतर किसी आंदोलन के बीज रहे हैं ? यह अपने मिजाज में आंदोलनधर्मी है या यह सिर्फ सालाना आलोड़न है ? क्या है इसकी ताकत और क्या है इसकी सार्थकता? मुड़कर देखने पर इस तरह के सवाल सहज ही उठते हैं। ऐसे सवालों पर बार-बार गौर किये जाने की जरूरत है। पहले हिंदी मेला का आयोजन 1995 की फरवरी में हुआ था। विस्तार में नहीं जाते हुए भी, यह याद रखने की जरूरत है कि 1984 में इिंदिरा गाँधी की हत्या के बाद प्रचंड बहुमत से सत्ता में आयी काँग्रेस के युवा नेता और भारत जैसे बहुआयामी देश के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की आँख में इक्कीसवीं सदी का सपना था। इस सपने में शुभ था तो अशुभ भी था, समझदारी थी तो थोड़ी-सी नादानी भी थी। सपनों के अंतरिक्ष के विघटित होने पर सपनों की धरती भी सिकुड़ने लगती है। मतलब यह कि बड़े वैश्विक सपनों के घायल होने से सामाजिक जीवन के बहुत सारे छोटे-छोटे सपनों का दम स्वत: घुटने लगता है। जिस समय राजनीतिक मुहावरा के रूप में इक्कीसवीं सदी का सपना भारत में उभर रहा था उसी समय बीसवीं सदी में देखा गया मानवीय इतिहास का सबसे बड़ा सपना घायल जटायु की तरह आहत होकर समता की सीता के अपहरण का दृश्य दखने की त्रासदी से गुजर रहा था। पाश जैसे कवि  इस त्रासदी की रचनात्मक पीड़ा की अभिव्यक्ति करते हुए रेखांकित कर रहे थे कि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना। नागार्जुन को याद करें तो, चंदू को सपना देखने की बात बताकर पुलकित होने का समय हमारे हाथ से छूट रहा था। भारत में इक्कीसवीं सदी का सपना एक ऐसे समय में आकार पा रहा था जब दुनिया को एक ध्रुवीय बनाने की साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ अपने को उन्नत तकनीक से जोड़कर सपनों के सौदागर के रूप में क्षितिज पर दाँत गड़ाने लगी थी। इक्कीसवीं सदी के सपने में अंतर्निहित शुभ-अशुभ एवं नादानी-समझदारी का गहरा ताल्लुक सपनों के सौदागरों से भी है। बहुत जल्दी ही मिस्टार क्लीन के रूप में प्रचारित इक्कीसवीं सदी के सपने के राजनीतिक मुहावरे का भारतीय नायक, राजीव गाँधी, का चेहरा भ्रष्टाचार के आरोपों से कुत्सित होता चला गया। भ्रष्टाचार की कुत्सा को धार्मिक मामलों के मंत्र-जल से धोने की कुचेष्टा की झलक शाहबानो प्रकरण और अयोध्या-विवाद के ताला खोले जाने में देखने को मिलती है। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को ताकत अयोध्या-विवाद के एक पक्ष से मिल रही थी और चुनौती भी। जिससे ताकत मिलती है उसी से चुनौती भी मिले तो सफलतापूर्वक उसका मुकाबला कोई कर नहीं सकता है। विश्वनाथ प्रतताप सिंह की सरकार इस बात को समझ रही थी। विश्वनाथ प्रतताप सिंह की सरकार ने अपनी ताकत के नये स्रोत के रूप में सामाजिक न्याय के सपनों और संभावनाओं से जुड़ने की भरपूर कोशिश की। इस कोशिश में सामाजिक न्याय के सपनों और संभावनाओं की राजनीतिक ऊर्जा तो बहुत तैयार हुई लेकिन विश्वनाथ प्रतताप सिंह की सरकार को इससे पर्याप्त कुमक नहीं मिली और उनकी सरकार की जान निकल गई। फिर से सत्ता हासिल करनेवाली काँग्रेसने नरसिंह राव के नेतृत्व में नई आर्थिक नीति को अपनाने के साथ ही भारतीय हितों के अधिकांश को साम्राज्यवादी आकांक्षाओं से नत्थी कर दिया। राज्य के कल्याणकारी मिजाज को विकास के सबसे बड़े बाधक के रूप में प्रचारित किया गया। यह इतिहास की विडंबना ही है कि सामाजिक न्याय के सपनों और संभावनाओं की राजनीतिक ऊर्जा से जुड़कर सत्ता में आये लोागें के लिए सामाजिक न्याय और राज्य के कल्याणकर उपाय सबसे बड़ा बोझ बन गया। सतह पर सरकार के रुझान में कुछ महीनों में ही पूरब-पश्चिम का यह दिशांतर हो गया ! इस नत्थीकरण और दिशांतरण के सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणाम जो पहले आशंकाओं के रूप में थे, धीरे-धीरे घटना में बदलने लगे। नतीजा यह कि आधुनिकता और प्रगतिशीलता की असमाप्य परियोजनाएँ प्राणांतक स्थगन के दौर में पहुँच गई। सांस्कृतिक पुनिर्माण के सपने के सामने नई चेतना और नई खुराक जुटाने की विकराल चुनौतियाँ खड़ी हुई। यह बहुत बड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चुनौती है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की इस चुनौती को अपने ढंग और अपने स्तर पर समझनेवाले लोगों के लिए हिंदी मेला जैसे आयोजन से वह खिड़की खुलती नजर आई जिससे प्राणवायु और रौशनी के साथ ही नई चेतना और नई खुराक के आमद होने की भी गुंजाइश बन सकती थी। इस गुंजाइश को हासिल करने धुँधली-सी आशारेखा को पकड़ कर चलने का साहस हिंदी मेला पिछले दस साल से लगातार करता आया है।

1995 में पहले हिंदी मेला का आयोजन हुआ। तब से कई साथी आये। कुछ दूर तक साथ दिया। कुछ देर तक साथ रहे। जो थोड़ी दूर तक भी साथ चले, जो थोड़ी देर तक भी साथ रहे, हिंदी मेला उन सबका शुक्रगुजार है। हिंदी मेला एक युवा स्वप्न है। इसीलिए, युवा शक्ति और प्रतिभा हमेशा इसके साथ रही है। यही इसकी ताकत भी है और सार्थकता भी है। यह कहना मुनासिब नहीं है कि हिंदी मेला ने अपने प्रयोजन को सिद्ध कर लिया है। यह भी नहीं है कि इसकी उपलब्धियाँ महान हैं।सच है कि हिंदी मेला सिद्ध मनोरथ नहीं है। न ही इसमें इतिसिद्धम का गरूर है। तब, इतनी-सी बात जरूर है कि सपनों की आसन्न मृत्यु की घोषणाओं के कठिन समय में भी सप्ताह व्यापी इस हिंदी मेला ने सपनों के सांस्कृतिक बिखराव को रोकने की भरपूर और ईमानदार कोशिश की है। एक वैकल्पिक संस्कृति की संभावनाओं को तराशने की जद्दोजहद को हिंदी मेला ने समझा है। ऐसी वैकल्पिक संस्कृति जिसमें इतना स्पेस जरूर हो जो यह समझ सके कि विचार और प्रतिविचार दोनों की तरंग को सम्हालनेवाली हवा एक ही है और उसे हर प्रकार के प्रदूषण से बचाने की जरूरत को अकेले कोई पूरा नहीं कर सकता है। हिंदी मेला में `हिंदी' सिर्फ एक भाषा को प्रतिध्वनित नहीं करती है। यहाँ `हिंदी' का अर्थ वैसा है जैसा `हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा' में है। गुम होते वतन को पहचानने और बचाने के लिए दुनिया के मेले के अंदर एक और मेला रचता है यह हिंदी मेला। हिंदी मेला भाषाओं को संस्कृतियों और सामाजिकताओं की सरहद नहीं मानता बल्कि  संस्कृति और सामाजिकताओं की सरहदों के पार जाने के हौसला का आधार मानता है। हिंदी मेला की आँखों को तलाश है दूसरी जगहों में किसी भी नाम और रूप से होनेवाले ऐसे ही मेले की जिसमें वैकल्पिक संस्कृति के पुननिर्माण रचाव का ऐसा ही स्वतंत्र संकल्प हो। आशा हो। हिंदी मेला एक आयोजन न रह जाए, बल्कि सिलसिला बन सके। पुनर्निर्माण और विकल्प आज के दो सबसे महत्त्वपूर्ण अर्थ-संकल्पनाओंवाले शब्द हैं। हिंदी मेला के भी बीज शब्द हैं। यह सालाना आलोड़न, जलसा या वैसा ही कुछ नहीं है। एक हिलोर है। यह उस अर्थ में आंदोलन नहीं है जिस अर्थ में आंदोलन की ताकत सामाजिक बेचैनी और राजनीतिक सत्ता की आकांक्षा हुआ करती है। इसकी प्रकृत गति का स्रोत तीब्र सामाजिक-बेचैनी में न होकर अपराजेय सामाजिक आशा में है। आशा यह कि विषमता की कठोर जमीन पर कभी पैर नहीं रखनेवाली समता की सीता का अपहरण कर विषमताओं के अ-शोकवन में डाल देनेवाले एक दिन ध्वस्त होंगे। आशा यह कि समता की सीता का वरण करनेवाले भी इस या उस बहाने विषमताओं के बीहड़ में उसके निष्कासन का षड़यंत्र नहीं रचेंगे।  हिंदी मेला इस सांस्कृतिक खतरे के सदर्भों को समझता है कि सीता को दुख अपहरण करनेवाले से ही नहीं वरण करनेवाले से भी मिलताहै। हिंदी मेला जानता है कि वह दुख के इस दुर्दम्य दोहराव को अपने अकेले के दम पर रोक नहीं सकता है। हिंदी मेला तो बस, सीता की गहन आशा को करुणा से सींचनेवाले बाल्मीकियों के सपनों और संभावनाओं का एक सिलसिला है। हिंदी मेला  के सातों दिन चलनेवाले विभिन्न कार्यक्रमों की अंत:सलिला भी यही सिलसिला है। हिंदी मेला को हिंदी समाज का दुलार चाहिए। मिल पायेगा? इसका जवाब बार-बार ढूढ़ना होगा।

साथी की तलाश में हिंदी मेला

संस्कृति मिलने से बनती है। जीवन साथ चलने से चलता है। मिलकर साथ चलने से जीवन सांस्कृतिक बनता है। मनुष्य के बारे में जो भी अच्छी बात कही जा सकती है उन सब का संबंध मिलकर साथ चलने से है। मनुष्य जीवन की सारी अच्छाइयाँ साथ मिलकर चलने से बनी है। इस बात को मनुष्य ने सभ्यता के प्रथम चरण में ही पहचान लिया था। सारी नदियाँ अपने उद्गम में अकेली और क्षीण होती हैं। आगे बढ़ती है, अन्य नदियों से मिलती है। इस मिलाप से उसका पाट बड़ा होता है। नदी सागर से मिलती है। यह नदी का अंत नहीं उसका सागर हो जाना है। जिस नदी को जितनी नदियों का साथ मिलता है उस नदी की उतनी ही गतिमयता बनी रहती है। जिन नदियों में जितनी गतिमयता होती है, उनमें सागर बनने की संभावनाएँ भी उतनी ही होती है। सागर बनने की संभावना ही नहीं जीवन को सर्वाधिक सेंच भी उन्हीं से मिलता है। आज नदियों को जोड़ने के महत्त्व को हम नये सिरे से समझ रहे हैं। मनुष्य को जोड़ने के महत्त्व को भी नये सिरे से समझना होगा। सभ्यता की नदियों को परस्पर जोड़ना क्या कम जरूरी है?

जो चल सकते हैं, उन्हें ही साथी मिलते हैं। ठहरे हुए को साथी नहीं मिलते। जिन्हें साथी मिलते हैं, वे ही गतिशील बने रह पाते हैं। जो गतिशील होते हैं उनका ही व्यक्तित्व व्यापक बनता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कह गये हैं कि ज्ञान-प्रसार के अंदर ही भाव-प्रसार होता है। समझना होगा कि आत्म-प्रसार के अंदर ही संवेदनात्मक ज्ञान का प्रसार संभव होता है। आत्म-संकुचन से न तो संवेदनात्मक-ज्ञान का प्रसार होता है और न भाव-प्रसार। आदमी सारे दुख उठाता है, पल-दो-पल के आत्म-सुख के लिए। आत्म-प्रसार ही आत्म-सुख का आधार बनता है। आत्म-संकुचन में आत्म-सुख नहीं आत्म-छल होता है। छल की आयु अज्ञान जितनी होती है। मनुष्य अज्ञान को दूर करता रहता है। अज्ञान के दूर होने से छल छँटता चलता है। यह द्विदिश सत्य  है। अर्थात, छल के भी छँटने से अज्ञान दूर होता है। दिशा चाहे जो हो, मूल बात यह है कि आत्म-छल के छँटे बिना आत्म-प्रसार नहीं होता है। आदमी नाना प्रकार के कष्ट-जाल में उलझता ही चला जाता है। इस ब्यूह को भेद कर बाहर निकलना ही मुक्ति है। इस ब्यूह से मनुष्य अकेले नहीं निकल सकता है। निकल सकता है तो साथ चलने से। मनुष्य है, तो उसे साथी की जरूरत सदा रहती है। साथी हर किसी को चाहिए। इसीलिए मुक्तिबोध कहा करते थे कि मुक्ति अकेले नहीं मिलती है। सभ्यता के दुख की आज की जैसी ही किसी उतप्त घड़ी में मन के सूने आँगन में मेला का समाँ बँध गया होगासाथी की तलाश में, चुपचाप।

आज के जीवन की विडंबना है कि आदमी भीड़ में अकेलेपन के तनाव और अकेले में भीड़ के दबाव को झेलते रहता है। इस तनाव और दबाव के बीच कचकते हुए विनोदकुमार शुक्ल कहते हैं कि हम साथी को नहीं जानते, साथ को जानते हैं। साथी को जाने बिना साथ को जानने का वहम कितनी देर तक टिका रह सकता है ! चाहे जैसे भी हो, साथ को जानने के लिए साथी को जानना बहुत जरूरी होता है। साथ चलने के लिए साथी को जानने का संकट कोई हमारे ही दुस्समय में प्रकट नहीं हुआ है। सभ्यता की शुरुआत से यह संकट मनुष्य के साथ बना हुआ है। तभी तो ऋगवेद की अंतिम ऋचा में सभ्यता विकास के सार-सूत्र को उपलब्ध कराते हुए `संगच्छध्वं सवदध्वं ' अर्थात मिलकर चलो  की सलाह दी गई। चलने की बड़ी चाह की पीड़ा के साथ संभावित साथी की तलाश में रवींद्रनाथ ठाकुर ने आत्म-संबोधित करते हुए रुद्ध कंठ से पुकार लगायी होगी कि जोदि तोमार डाक सुने केउ न आशे, तबे तुमि एकला चलो, एकला चोलो रे। अपने संकीर्ण होने का पहला ही लक्षण है, दूसरे को संकीर्ण मानना। आज के `हिंदू जागरण' जैसे कार्यक्रमों ने हमें इतना संकीर्ण बना दिया है कि कभी-कभी नवगोपाल मित्र और रवींद्रनाथ ठाकुर के परिवार का `हिंदू मेला' भी संकीर्ण लगने लगता है। हम उनकी पीड़ा का अनुमान भी नहीं लगा पा रहे हैं। साथ चलने के लिए साथी की चाह में ही रवींद्रनाथ ठाकुर ने विषमताग्रस्त हिंदू समाज की विषमता को दूर करने के लिए `हिंदू मेला' के आयोजन की बात सोची होगी। आज के तुमुल कोलाहल से उत्सर्जित हलाहल के दुष्प्रभाव से आक्रांत हम ऐसी किसी पुकार को ठीक से कहाँ सुन पा रहे हैं, साथी। उपस्थित महाभारत को अकेले-अकेले जीत लेने के प्रति जितने आश्वस्त हम होते जा रहे हैं, उतना आश्वस्त इसके पहले शायद ही कोई रहा हो।

आज से आठ साल पहले साथ चलनेवाले साथियों की ऐसी ही तलाश में `समकालीन सृजन' ने `सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन' की स्थापना कर कोलकाता में `हिंदी मेला' की शुरुआत की थी। बोली समाज में बँटे और विखंडित हिंदी समाज को परस्पर निकट लाने तथा गैर हिंदी भाषी प्रदेश में रहते हुए हिंदी समाज और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच एकता के शिथिल होते संबंधसूत्र की जीवनी शक्ति को बनाये रखने के उद्देश्य से मातृभाषा को लोकप्रिय बनाने के संकल्प के साथ शुरू हुआ था यह `हिंदी मेला'। छोटे स्तर पर प्रारंभ हुआ हिंदी मेला अब बड़ा हो गया है। लेकिन आज भी यह इतना बड़ा कहाँ हो पाया है कि किसी भी प्रेरणा को सही संदर्भ और जरूरी उत्साह के साथ पकड़ पाने की कमतर क्षमतावाले विशाल हिंदी समाज में इसे सम्मानपूर्ण स्वीकृति प्राप्त हो। यह काम सीमित स्थान और संख्यावाले समूह के लोगों के एकक उद्यम से संभव भी नहीं है। एक दीया से अमानिशा को जगमग कर देनेवाली दीपमाला नहीं सजती है। दीपमालाओं के मन में सूरज की अनुपस्थिति का मलाल नहीं होता है। आज पूरी दुनिया की सामाजिकताओं पर छाया संकट उनकी भाषाओं के अनिवार्य लोप के रूप में प्रकट हो रहा है। भाषाओं के बुझने से सामाजिकताओं का घर-आँगन गहरे अंधकार में डूब रहा है। इस गहन अ्ंाधकार को दूर करने के प्रयासों को दीपमाला के रूप में सजाकर संकट को उत्सव में बदलने के ये प्रयास तभी सार्थक हो सकते हैं जब विभिन्न स्थानों पर ऐसी ही दीपमालाएँ सजाई जायें। न तेल की जरूरत है, न बाती की। जरूरत है तो बस, अँधेरे के खिलाफ सुलगने के लगन की। दीया अँधेरे के खिलाफ जूझने की हसरत बनकर ही चमकता है। दीया निरर्थक नहीं जलता है। ऐसे ही किसी प्रयास के दौरान साथी भी मिलते हैं। साथ भी मिलता है। मिलकर चलने का हौसला भी मिलता है और भरोसा भी। कहते हैं अरुण कमल न चलें तो टूटेगा भरोसा । इसलिए, चलिए साथी – `आत्मदीप' होने के बुद्ध पथ परथोड़ी दूर ही सही, पर चलिए साथी। हिंदी मेला युवा प्रतिभाओं का उत्सव भी है, संघर्ष भी। प्रेरणा भी है, प्राण भी। सुमन भी है, सुरभि भी। इस मेला को हम सब का स्नेह भी चाहिए, सम्मान भी।