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रविवार, 10 जनवरी 2016

अनामिका की कविता

अनामिका की कविताओं में स्त्री जीवन और मन के अद्भुत रचाव का अपना मिजाज ध्यान खींचता है। अद्भुत इसलिए की स्त्री जीवन और मन के अंतःकरण के जो प्रसंग उनकी कविताओं में प्रकट होते हैं वे कविता की संरचना के बाहर किसी भी भाषिक संरचना में प्रकट नहीं हो सकते। विवाह संस्था और पितृसत्ता की परिवार व्यवस्था का गहरा और दर्दिला संबंध स्त्री जीवन से रहा है। विवाह संस्था और स्त्री पदार्थ का द्वंद्वात्मक प्रश्न किसी न किसी रूप सभ्यताओं के आसपास मंडराता रहा है। अनब्याही औरतें, इस संदर्भ को न सिर्फ मीरा काव्य के सामाजिक संदर्भ से जोड़ती है बल्कि, इस के व्याज से आज की कामकाजी महिलाओं की मानसिकता के द्वंद्व को भी बहुत ही करीने से उभार कर रख देती है। इस द्वंद से ऐसी व्यथा जनमती है जो माँ को संबोधित होकर भी उस के समक्ष अभिव्यक्त होने से ठिठक जाती है। इस ठिठकन का संबंध विवाह संस्था और पितृ व्यवस्था के द्वारा माँ नाम की स्त्री सत्ता के अनुकूलन से अनिवार्यतः जुड़ा हुआ लगता है। इसे समझने और महसूस करने की स्त्री क्षमता का पुंसकोड से भरी भाषा की कविता में निर्विकल्पतः उतरना इस कविता को महत्वपूर्ण बना जाता है। "माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की, माई री!" और इस तरह कविता अपनी महत्वपूर्णता में हासिल करती है, साहस भी और सद्भावना भी!

प्रथम स्राव की झंकृति अनहद-सी बजती हुई काँपती लड़की को महीयसी मुद्रा में ला खड़ी करती है। कहना न होगा अनहद में कबीर का नाद है। उस कबीर का नाद जो प्रेम में उन्मत्त होकर खुद दुल्हिन का मंगलचार गाने लगता है। याद है ना सखी संप्रदाय का सांस्कृतिक प्रसंग की !

चौकों के सारे बर्तनों के धुल चुकने के बाद और आखिरी चूल्हे की आग ही नहीं राख के भी बुझ चुकने के बाद अपने वजूद की आंच के आगे खुद को ही सानती और
खुद को ही गूंधती हुई
ख़ुश होकर पृथ्वी की तरह रोटी बेलती है स्त्री। कविता के, स्त्री के, पृथ्वी के इस तरह से खुश होने या खुश हो जाने में ही इस सभ्यता के सातत्य का रहस्य है।
सच कहूँ तो, पुंसकोड से भरी भाषा में इन कविताओं की संवेदना को ठीक-ठीक समझना और सामाजिक करना बहुत आसान नहीं है, कम-से-कम मेरे लिए। खैर बाकी दोस्त लोग सम्हाल लेंगे।